आज़ादी
ना करो तुम शिकवा गैरों से, वो इसके हकदार नही। जब दिल ही पत्थर हो अपनों का, किसी शिकायत की वहाँ दरकार नही। तुम कसम खाये बैठे हो अगर हमे रुलाने की, मन में मान लिया हमने यह वजह तुम्हारे मुस्कुराने की। लो ना है कोई शिकवा और शिकायत अब तुमसे, अब ना रोको खुद को जुदा हुए अब तुम हमसे। लाख कोशिशे कर भी तुम्हें समझा ना सका, तुम्हें खुद का निर्दोष चेहरा भी दिखा ना सका। मुझसे ज्यादा गैरो की बाते तुम सुनते थे, और गुस्से की आग में हर पल हम भुनते थे। ना देनी है कोई सफाई अब हमको, अब ना हम याद तुमको ना तुम याद हमको। बना दिया सरेआम तमाशा मेरा, एक बार भी नही सोचा मैं हु आशिक़ तेरा। लगने लगा था तुमको मैं बोझ बन गया हूं, तुम्हारी आज़ादी का मोल बन गया हूं। इस आज़ादी की कीमत मैंने चुकाई है, तुम्हें रिहा कर मैंने आज फिर मोहब्त निभाई है।। इस आज़ादी को अब तुमसे कोई नही ले सकता, याद रखना मेरे जैसी मोहब्बत कोई तुम्हें दे नही सकता। हो सकता है एहसास तुम्हें भी हो जाये कभी? न होना उदास मैं न रहा होंगे तुम्हारे साथ सभी।। हर कसम वादे से तुमको मैंने आज़ाद कर दिया था, जिस दिन दूसरे से बात का एहसास दिया था।। लो आजा...